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शब्द ना है मेरे पास

शब्द ना है मेरे पास
कलम पकड़े हूं हाथ में

नज्म है लिखने की
डरता हूं कलम फिसल न जाए कहीं

है आलोचक मेरे पीछे पड़े
आलोचना कर ना दे भला और बुरा

लिख दिया ऐसा क्या हाय मैं आज
पढ़कर भ्रम में ना पड़ईएगा

कलम पकड़े थे हाथ में,
खुद ब खुद चल पड़ी आज।

✍️कार्तिक कुसुम

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