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माधव

माधव... तेरे सम्मुख हूँ। नादान हूँ, मूर्ख हूँ। तू सर्वज्ञ है, तू मन की जानता है। क्या माँगूँ? तू ही तो विधाता है। मेरे हृदय में तू, मेरे गीत में तू। हर पल गाता हूँ, तुम्हें ही गुनगुनाता हूँ। आज नि:शब्द हूँ। ज़रा देख तो, मेरे हृदय की पीड़ा। हृदय के कोने में, किसी को खोने का भय... ✍️Kartik Kusum 

स्मृतियों का संग्रहालय।

यह मधुमास मिला है साथी, आओ मिलकर रास रचाएँ, यह क्षण-भंगुर पल ढल जाएगा, मिलकर नव-आनंद मनाएँ। साक्षी केवल रह जाएँगी छाया-छवियाँ, वीथी-गलियाँ, गगन-सितारे और कलियाँ! जब युग-युग बाद सँभालेंगे, अतीत के बिखरे पन्नों को, याद करेंगे पग-पथ सारे, वाटिका-पुष्प और उपवन को। स्मृति-पट पर उभर आएगा, वह स्वर्णिम महाविद्यालय, याद आएँगे सखा-सहचर, वह नेह-सनेहा का आलय। हम मंद-मंद मुसकाएँगे, क्या पावन दिन वे पावन थे! अगाध-अतल वह बंधुत्व था, मीठे शिकवे मनभावन थे! वह प्रथम-प्रणय की रसमयता, प्रेयसी-दृष्टि का वह प्रकाश, अनुराग-विवश वह पागलपन, ढूँढता रहा जो निज-आकाश! कॉलेज के तुंग-द्वारों पर, निज प्रिय के पथ को जोहना, चंचल नयनों के नीरद से, उस रूप-सुधा को मोहना! जीवन का यह संपूर्ण चित्र, केवल स्मृतियाँ बन जाएगा, समय-चक्र के आवर्तन में, यह रूप-दृश्य ढल जाएगा। अतः सहेज लो इन दृश्यों को, लोचनों के नीड़-विहंग में, एक संग्रहालय रचो हृदय में, जहाँ सुरभि हो प्रति-रंग में। जब काल-चक्र के पन्ने कुछ, अतीत-गर्भ में जाएँगे, तब इस संचित संग्रहालय से, कुछ चित्र निकाल लाएँगे... हम पुनरावृत्ति के क्षण में जाकर, अमर-सुकून पा जाएँ...

मन में राधा..

मन में राधा, मन में श्याम, मन ही बन गया वृंदावन धाम। मन में राधा, मन में श्याम, मन ही बन गया वृंदावन धाम। निरंतर जपूँ राधा-राधा, कट जाएँ जीवन की सब बाधा। प्रभु आप बसें अंतर्मन में, आपसे खुशियाँ आएँ जीवन में। हर पल भजूँ मैं तेरा नाम, तेरी भक्ति ही मेरा काम। माधव, कैसी लीला तेरी, तूने जीवन-नैया सँवारी। सारे कार्य पूर्ण हुए, रहा न कोई शेष। श्याम-रंग में रंगा जो मन, मिट गए सारे द्वेष। चरणों में अब मिला ठिकाना, हर पल दूर हुआ क्लेश। जहाँ प्रेम है, वहीं श्याम हैं, समर्पण में ही सच्चा विश्राम है। न कहीं जाना, न कुछ पाना, राधा-नाम ही मेरा धाम है। मन-मंदिर में दीप जले, श्याम कृपा की पहचान है। धेनु चरावत श्याम-सलोने, वृंदावन की छवि मन भाए। उन चरणों में शीश नवाऊँ, जहाँ से जीवन अर्थ पाए। राधा-भाव में श्याम समाए, श्याम-नाम में राधा वास। जीवन धन्य हुआ प्रभु से, मिल गया सच्चा विश्वास। Kartik Kusum Yadav 

नयना तोर निरखत

नयना तोर निरखत, सपना देखत, सुघर रूपवा, गोरी तोर चमकत। बलखत केशिया, जान मारे हमरा, तोर बिना हम हियो अधूरा। सूरतिया बस गइल जब से दिल में, मन न लागे हमरा कोनो महफिल में। ई दिलवा तो दीवाना हो रानी, तोहर प्यार में । बाटियां निहारो हियो, तोरे इंतजार में। जे दिन तोर मिलन न होई, ओ दिन मनवा खूबे रोई। तोहर याद में बइठल रहि जाई, अँखियन में तैरै तोरे छविया। मन में ऊ चेहरा, बेरी-बेरी आवे, ऊ सुघर रूपवा, केतना सतावे। नील नयनवा तोर, नशा करावे, ऊपर से चश्मा, जान मार जाए। देहिया के अंगिया, नेहिया बढ़ावे, हमर सपनवा में बस तू ही आवे। मन न लागे एको पहर तोर बिन, रतिया कटे अब तारे गिन गिन। मन करे प्रेम के पंछी बन उड़ जियो, तोहर अटारिया पे आ के बइठी जियो। दिलवा के बतीयां तोहरे बतिईयों। केतना प्यार बा हमर दिल में एक पल बता दी तोह से मिल के। नयना तोर निरखत, सपना देखत, सुघर रूपवा, गोरी तोर चमकत। ✍️ रचनाकार: कार्तिक कुसुम मेरी और भी लिरिक्स पढ़ने के लिए नीचे दिए गए  लिंक पर क्लिक करें 👇 https://mittikesur.blogspot.com

किसने छीनी कलम?

जिन हाथों में कलम थीं, जो दिन-रात कागज़ों से संघर्षरत थे, सुनहरे अक्षरों में सपनों को बुनते, हर दिन जीवन के नए अध्याय गढ़ते। दिल में बस एक चाह — देशप्रेम और सेवा का भाव। निर्मल हृदय, शांत चित्त, न धन की भूख, न लोभ की चाह। लेकिन... अगर उन्हीं हाथों में बंदूकें आ जाएं, और वे चलाना भी सीख जाएं — तो पहले उन्हें पकड़ो, जिन्होंने उन हाथों में बंदूकें थमाई। साथ ही यह भी जानो — कलम पकड़ने वाले हाथों में बंदूकें क्यों आईं? उन्हें ढूंढो, उन्हें कोई पकड़ो! ✍️ कार्तिक कुसुम यादव

यह कैसी है बुढ़ापा?

उमर के आखिरी पड़ाव में सब कुछ नष्ट कर जाएगा। सारे रिश्ते, नाते, प्यार समय की आग में चट कर जाएगा। कौन संजोएगा? कौन ढोएगा? यहां तो हरेक हृदय में विष भरा पड़ा है। जिन्हें करनी थी समतामूलक समाज का निर्माण, जिन्हें बनानी थी एक नई पहचान। कुछ कर गुजरने का जिगरा रखना था, निजी स्वार्थ से ऊपर उठना था। सेवा के पथ पर चलकर प्रेम का दीप जलाना था। दो टूटे परिवारों का सेतु बनकर कंठहार में स्नेह पिरोना था। पर उनकी मति मारी गई, वह तो हारी गई। अपने को मार कर बैठ गया, खुद से हार कर वह बैठ गया। उन्हें किसी दूसरे की अच्छाई भाती नहीं, उन्हें अच्छाई आती नहीं। ईर्ष्या, लोभ, की वेदना में डूबा — यह कैसी है बुढ़ापा! जिन्हें चलना था भजन-मार्ग पर, जिन्हें पढ़नी थी जीवन-दर्शन की किताबें। गेरुए वस्त्र धारण कर ललाट पर लगाना था चंदन तिलक। “ॐ नमः शिवाय” का जाप कर मोक्ष की राह पर अग्रसर होना था। पर वह जीवन के झंझावात में फँस गया, वासनाओं की भीड़ में उलझ गया। न मोह छूटा, न माया छूटी, वह सड़कों पर बहता गंगाजल बन गया। कोई उन्हें निकाले, कोई उन्हें बचाए, मानवता की नाव फिर से खे जाए। अब भी समय है — संघर्ष से ऊपर उठने का, हृदय...

"टूटल सपना, भींजल खेत"

सोनवा नियन गेहुआं,   सोनवा नियन खेत।   देखी के किसान के   भर गेल हले पेट। नरम-नरम हथिया से सहलउलकी,   प्यार से गेहुआं के बाली।   सुघ्घर गेहुआं देख के,   हम सपना लगलीं पाली। सोचलीं–   ए साल गेहुआं बेच के   छोटका के सहर पढ़ई भेजब।   स्कूल में नाम लिखइब।   ओही पइसा से   छोटका ला जूता-चप्पल किनब।   पढ़ाई करईब, बड़ आदमी बनइब। बाकी विधाता ऐसन बरखा कर देलक   कि जीते जी हम मर गइली।    सब कुछ बह गेल।   सपना चकनाचूर हो गेल।   खेत के सोनवा   पल भर में मिट्टी भेय गेल। किसान छाती पीटऽ हथ   लाडो बेटी के गोदी में बइठा के।   बोलऽ हथ—   लाडो बेटिया, तोहसे भी वादा कइने रहलीं।   पाँव में पायल पहिरइब।   देहिया ला फ्रॉक और अंगिया किनब। माफ कर देब लाडो बेटिया—   अपन तो एहे बाप हई।   जे कुछ ना कर सकल तोहार खातिर। --- लेखक – कार्तिक कुसुम यादव  भाषा – मगही   व...

कविता, तू कायर है...

तू कायर है तूने अपना परिचय दिया, बदले की भावना में बहकर, दूसरो का सहारा लिया। तुझे लगा कि तू रणनीतिकार है, नहीं रे... तू बेकार है। तू बेकार इतना कि, तुझसे तुलना पंक के कीड़े से करना व्यर्थ। तुझझे नहीं हो पाएगा, तेरे कृत का है यही अर्थ। तुझे क्या लगा? मैं इस तुच्छ चीजों से विचलित हो जाऊंगा, बदले की भावना में बहकर, मैं तुझसे लड़ूंगा। नहीं रे... जो स्वीकार कर लिया हार का, जिसके सामने डाल दिया तू खड़ग, उनके साथ ऐसे कृत्य सुशोभित नहीं। अगर अभी भी है भुजाओं में बल, और रखते हो युद्ध कौशल, तो आ... तुझे ललकार रहा हूं, आमने-सामने की लड़ाई लड़। अगर मां के स्तन का क्षीर पिया हो, तो कर युद्ध निडर। मुझे पता है रे... तेरे रगों में कायरों का खून है। भुजाएं शक्तिहीन हैं। रण की तलवारों की टकराहट सुन, तेरे हृदय का स्पंदन होता शून्य। तू रण के लायक नहीं। तू कायर है रे... तू कायर सही। ✍️ Kartik Kusum Yadav

नदी किनारे देवालय

नदी किनारे देवालय  ऊपर ओढ़े चादर किसलय। फूल-हरि पत्तियां अर्पित  सलिल पांव पखारे। टन-टन बजती घंटियां साधु संत करते आरतियां  वातावरण सुंदर सुहावन लगे मंदिर में जब घंटी बजे गीत सुनाती जल धारा कल-कल कर बहती गाती शांत, सौम्य, मनोरम दृश्य देवालय खींच लाती। ✍️ Kartik Kusum Yadav

जिनगी के असल रंग

युवा लोगन सभे,   इंस्टा पर झूमे,   गावे ला तराना,   देखअ ई कैसन जमाना।   रात-दिन मोबाइल में भुलाइल,   खेलअ-कूदअ त गइल भूल।   घर के कौना में सिमटल जिनिगी,   रंग-बिरंग सपना सभ मिटल।   माटी में खेलल भुलाईल,   जिनिगी जिए के मने भुलाइल।   कैसे समझाईं, ओहके कैसे मनाईं?   ए सुगना, ए बबुआ!   तनी घर से बाहर निकलअ,   खेलअ, कूदअ, दौड़अ धूपअ,   ई खुलल फिजा में विचरअ,   जीवन के असली रंग निहारअ।   खेतवा में सरसों के पियरी,   आपन नयन से तनि देखअ,   अमवा के डाली पर कोयली कूके,   ओकर मधुर तान सुनअ।   फुलवा पर देखअ   कैसे रंग-बिरंग तितली मडरातअ,   सुबह के ललकी किरिनिया,   घासवा पर शबनम के बूंद नया,   देखअ कैसे चमकअ त।   बांस के झुरमुट में   चहके ल चिरइया,   उजर आसमान में उजर बगुला,   देखअ कैसे उड़ रहल ह।   बगिया में दे...

प्रेम और परिवर्तन का संदेश

शक न करअ,   जिद पर न अड़अ,   ई बुरी वला ह।   सपना जे तोहार बा,   मन में जे इरादा बा,   उहो निक न ह।   मन में जे ईर्ष्या बा,   जीवन में ऊहापोह बा,   ओकर कारण तू ही ह।   ई काल चक्र ह जीवन के,   ई नित्य नवीन परिवर्तनशील ह।   तू कहा फसल बाड़नऽ   ई भौतिक वस्तु के मोह-माया में?   ई नश्वर, क्षणभंगुर ह।   एकरा जानअऽ, एकरा मानअऽ।   जिह्वा देलहन भोले बाबा,   त तनी शुभ-शुभ बोलअऽ।   बतइयां करे से पहिले तनीक,   हृदय के तराजू पर तोलअऽ।   अपन अहंकार के त्यागअ$,   प्रेम-दुलार के रंग में रंग जा।   प्रेम में ऐसे डूबअऽ,   जैसे हर जन आपन लागे।   ✍️ Kartik Kusum Yadav

छात्रों का अधिकार और आंदोलन की पुकार

शिक्षा, न्याय, रोजगार हक है हमारा।   लाख यातनाएं दो हमें,   लेकर रहेंगे अधिकार हमारा।   अरी ओ पुलिस कप्तान,   तूने जो लाठी चलवाई,   बन गया तू निर्दयी कसाई।   छात्रों की समस्या,   तुझे तनिक भी नजर न आई।   किसने आज्ञा दी तुझे   हम पर लाठी बरसाने की?   जाओ उस निकम्मी सरकार से कह दो   "छात्र आ रहे हैं, सिंहासन खाली करो!"   गुस्से का लहू रगों में दौड़ रहा है।   समर शेष है रण की।  अब आंदोलन का नाद सघन होगा,   गूंजेंगी शहर की सड़के और गलियां।   इंकलाब! इंकलाब! इंकलाब की बोलियां। अरे, बनकर निकलेगी जब सड़कों पर   अलग-अलग छात्रों की टोलियां।   ओ पुलिस! तेरी बंदूकें धरी की धरी रह जाएंगी,   कुछ न बिगाड़ पाएंगी गोलियां।   अभी भी वक्त है,   छात्रों का हृदय विशाल है।  जाओ, हमारी मांगों का संदेशा   उस कुंभकर्णी नींद में सोई सरकार तक पहुंचाओ।   कहना—   याचक नहीं हूं,...

आत्मबोध का आह्वान

तुझे लड़ना है,   मुझे प्यार बांटना है।   तुझे तोड़ना है,   मुझे जोड़ना है।   तेरी वाणी असभ्य,   मेरी सौम्य और सभ्य।   तू भौतिकता को सर्वोच्च माना,   मेरे लिए तुच्छ जहाँ सारा।   तेरे संस्कार तुझे मुबारक हो,   आओ संवाद करें,   सबकुछ यहाँ बराबर हो।   क्यों रूठे हो एक भूखंड के खातिर?   यह तो किराए का है,   आज तेरी तो कल किसी और की होगी।   अवसर मिला है क्षणिक,   मिलबांट कर उपभोग करो,   यही है इसका गणित।   इतनी बौद्धिकता भी नहीं,   तो तू उपभोग के अधिकारी नहीं।   त्याग करो, वत्स,  लोभ, मोह, मद, मत्स का।   अंगीकार करो, वत्स,   सत्य, न्याय, और सच का।   जिसने इसे स्वीकारा है,   वह फला-फूला और खुद को संवारा है।   जीवन के आखिरी पड़ाव पर सही,   कुछ करो आज और अभी यहीं।   घृणा की धधकती ज्वाला से बाहर निकलो,   अपने कोमल नयन संग मुस्...

नाम देव काम ऐब

नाम देव, काम ऐब   बातों में छल, दिखे फरेब।   देव का अर्थ, देवत्व से भरा,   शब्दों में उसकी, महिमा गहरा।   कैसी विडंबना है इस संसार की,   मनुज का नाम रखा ‘देव’ यहाँ,   मुख से निकले, शब्द अहंकारी,   गर्व से पढ़े, गालियाँ यहाँ।   थू-थू कर सब थूकें उसे,   कहे, "अरे मूर्ख! मत पढ़ गाली।"   संभाल मर्यादा, कर ख़्याल,   ईश्वर से कर, तू एक वादा।   मत कर रसपान गाली का,   रख संजीवनी, वाणी का। ✍️ कार्तिक कुसुम यादव

प्रभु

प्रभु तू हर ले,   काम, क्रोध, वासना को।   प्रभु तू हर ले,   छल, कपट, लोभ तृष्णा को। दिव्य मन, चंचल हो चितवन,   ऐसी वर दे, ऐसा हो तन-मन।   सद मार्ग पर चलकर नित्य,   अर्थपूर्ण हो मेरा कृत्य। प्रीत ऐसी हो वतन से,   खुद को अर्पण कर दूं, वतन पे।   आलस्य, निर्जीवता त्याग कर,   सजीवता का अंगीकार करू। प्रभु के चरणों में,   प्रभु का जय-जयकार करू।   मांगू हर चीज उनसे,   भारत देश के कल्याण का। सत्य, अहिंसा का हो वास,   हर हृदय में हो विश्वास।   धर्म और कर्म की हो साधना,   संविधान की हो आराधना। जन-जन में जगे नई आशा,   सपनों का भारत हो अभिलाषा।   भ्रष्टाचार से दूर हो हर जन,   सुचिता हो भारत की पहचान। विज्ञान, कला और नवाचार,   शिक्षा में हो अपार विस्तार।   सद्भाव, समानता, हो स्वाभिमान,   हर नर-नारी का हो सम्मान। पर्यावरण का हो संरक्षण,   हरे-भरे हों वन और उपवन।   जल, मृदा, औ...

पंच परमेश्वर

यह कैसा पंच परमेश्वर ? जिसमें न हो सत्य का स्वर  उनकी बात सुनो  तो,  बाते करता धरा से अम्बर । नीति व नियति का ज्ञान नहीं नैतिकता, रत्ती भर नहीं  आदर्श-मर्यादा को ठुकराकर अपने वचनों को ठहराहटा सही। यह कैसे पंच परमेश्वर  जिसमे न हो सत्य का स्वर खुद की तारीफो में कसीदे पढ़ते  कितने झगड़े को सुलझाया  यू ही, मैं पलक झपकते । वो अपनी अतीत की दुनिया  से, सबको रूबरू कराता। महज सौलह वर्ष का रहा होगा न्याय वेदी का प्रतिमूर्ति कहलाता। इतने दिव्य गुणों से सुशोभित  क्यों नहीं रखते प्रियजानो से मीत ?   कभी तो अपने उर, टटोलकर देख। या पढ़ प्रेमचंद्र रचित, अलगू चौधरी और जुम्मन शेख। असली पंच परमेश्वर से साक्षात्कार होगा तेरे अधरो पर न्याय का स्वर आएगा। हे दुनिया-जहान के न्याय देवता तेरे घर में भी नहीं है एकता। आपके कौशल और चातुर्य  अपनो के न्याय में क्यों पड़ जाती हैं शिथिलता । यह सब देख मुझे, होती हैं हैरानी और कौतुहलता। संपत्ति की इतनी लोभ दुर्गति होगी, करो जरा तुम क्षोभ कैसे समाज गढ़ना चाहते हो ? सिर्फ संपत्ति ठगने की चाह रखते हो। वो दिवस आज भी याद...

आदिवासी

उस निविड़ अरण्य का वासी निश्चल ,निर्भीक रहने को आदि  हष्ट - पुष्ट भुजाएं विशाल छाती आधे -कपड़े पहने धोती खाकी  सुबह से शाम खेत में मेहनत, परिवार के लिए रोटी-दाल, पर्यावरण के प्रति प्रेम, वनदेवी का  आशीर्वाद। परिवार के साथ खुशहाल जीवन, प्रकृति के बीच अथाह प्रेम  आदिम संस्कृति का संरक्षण, वनवासी का संस्कार।

नागी जलाशय

नागी जलाशय में पक्षियों का कलरव  गुंजित हैं, चारो दिशा में, इनके स्वर मधुर और नीरव। नभचर है वो, सुंदर है वो इनके संगीत में छुपा है, जीवन का सार। कितने दिव्य गुण समाहित है इस पंखधारी प्राण में। अमृत है, जीवनदायनी है सुमधुर है, इनके चहक रवानी है। अपनी विद्यमानता से सबको पुलकित कर नागी जलाशय को सुशोभित करते। वह दृश्य कितना मनोरम लगता, जब उजले व्योम से कोई खग शने-शने उतरता जलाशय पर। वह निश्चल-निर्भय होकर तैरता अविराम  असंख्य पंखधारी बन आते यहां मेहमान। ओ मनुज कभी तो आओ, जीवन के झंझावात को छोड़कर। आओ बैठो कुछ पल, इस जलाशय के तट पर। देखो कैसे शांत जल में खग खिलते कमल की तरह दिखते मनमोहक। उनके कलरव से गूंजता है वातावरण जैसे कोई मधुर संगीत हो रहा है प्रसारण। कभी उड़ते हैं, कभी तैरते हैं कभी मित्रों संग अटखेलियां करते हैं कभी शांत बैठकर आकाश निहारते। इनकी चंचलता देखकर चित्त होता है प्रसन्न जैसे कोई स्वर्ग का दृश्य हो रहा प्रस्फुटन। नागी जलाशय में पक्षियों का कलरव, है जीवन का एक अनमोल अनुभव। इससे मिलता है मन को शांति और सुकून, जैसे कोई दिव्य आशीर्वाद  हो रहा प्रचुर।** ✍️Kartik Kusu...

गौरैया और मैना: प्रकृति की चहचहाती विरासत, विलुप्त होने की कगार पर

परिचय : गौरैया और मैना, ये दो छोटी चिड़ियां जो कभी हमारे घरों में, खिड़कियों पर, पेड़ों पर, और हर जगह चहचहाती रहती थीं, आजकल कम ही देखने को मिलती हैं। इनकी घटती संख्या पर्यावरण के लिए एक गंभीर खतरा बन गई है, और इनके विलुप्त होने की संभावना एक चिंताजनक विषय है। गौरैया और मैना का महत्व: गौरैया और मैना पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये कीटों को खाकर फसलों को बचाती हैं, बीजों को फैलाकर पौधों के प्रजनन में मदद करती हैं, और प्रकृति के सौंदर्य का एक अभिन्न अंग हैं। इनकी चहचहाहट जीवन में खुशी और उत्साह लाती है। गौरैया और मैना के विलुप्त होने के कारण: गौरैया और मैना के विलुप्त होने के कई कारण हैं, जिनमें शामिल हैं: आवास विनाश: शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, और कृषि के विस्तार के कारण इन पक्षियों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं। कीटनाशकों का उपयोग: खेती में अत्यधिक मात्रा में कीटनाशकों के उपयोग से इन पक्षियों के लिए भोजन की कमी हो रही है, और इनके स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन: जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान और मौसम में बदलाव इन पक्षियों के जीवन चक्र को प्रभा...

महावीर वाटिका जमुई: बिहार की वन-पर्यावरण और पर्यटन की धरोहर

बिहार के जमुई जिले में स्थित महावीर वाटिका एक विशाल इको पार्क है। यह पार्क NH-333 के किनारे चकाई से देवघर जाने वाले मार्ग पर स्थित है। यह बिहार और झारखंड का सबसे बड़ा इको पार्क है, जिसका क्षेत्रफल 110 एकड़ है। यह जिले के चकाई प्रखंड के माधोपुर गांव में स्थित है। महावीर वाटिका का महत्व महावीर वाटिका का महत्व कई मायनों में है। यह बिहार और झारखंड के लिए एक महत्वपूर्ण पर्यटन और पर्यावरण स्थल है। यह पार्क लोगों को प्रकृति के करीब लाने और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। पर्यटन स्थल के रूप में महावीर वाटिका बिहार और झारखंड के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। यह पार्क हर साल लाखों पर्यटकों को आकर्षित करता है। पर्यटक यहां विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं और प्राकृतिक सुंदरता का आनंद ले सकते हैं। महावीर वाटिका में कई आकर्षण हैं, जिनमें शामिल हैं: 1.  कल्पवृक्ष का वन: इस पार्क में 277 से अधिक कल्पवृक्ष के पौधे लगे हैं। यह भारत का एकमात्र इको पार्क है, जहां कल्पवृक्षों का वन है। कल्पवृक्ष को हिंदू धर्म में एक पवित्र वृक्ष माना जाता है। कल्...