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पंच परमेश्वर

यह कैसा पंच परमेश्वर ?
जिसमें न हो सत्य का स्वर 
उनकी बात सुनो तो, 
बाते करता धरा से अम्बर ।

नीति व नियति का ज्ञान नहीं
नैतिकता, रत्ती भर नहीं 
आदर्श-मर्यादा को ठुकराकर
अपने वचनों को ठहराहटा सही।

यह कैसे पंच परमेश्वर 
जिसमे न हो सत्य का स्वर

खुद की तारीफो में कसीदे पढ़ते 
कितने झगड़े को सुलझाया 
यू ही, मैं पलक झपकते ।
वो अपनी अतीत की दुनिया से,
सबको रूबरू कराता।

महज सौलह वर्ष का रहा होगा
न्याय वेदी का प्रतिमूर्ति कहलाता।
इतने दिव्य गुणों से सुशोभित 
क्यों नहीं रखते प्रियजानो से मीत ?
 
कभी तो अपने उर, टटोलकर देख।
या पढ़ प्रेमचंद्र रचित,
अलगू चौधरी और जुम्मन शेख।

असली पंच परमेश्वर से साक्षात्कार होगा
तेरे अधरो पर न्याय का स्वर आएगा।
हे दुनिया-जहान के न्याय देवता
तेरे घर में भी नहीं है एकता।

आपके कौशल और चातुर्य 
अपनो के न्याय में
क्यों पड़ जाती हैं शिथिलता ।

यह सब देख मुझे,
होती हैं हैरानी और कौतुहलता।

संपत्ति की इतनी लोभ
दुर्गति होगी, करो जरा तुम क्षोभ

कैसे समाज गढ़ना चाहते हो ?
सिर्फ संपत्ति ठगने की चाह रखते हो।

वो दिवस आज भी याद मुझे 
कैसे सब आपस उलझे।

इस क्षणिक जीवनकाल में 
सुई नोक भर के लिए भूमि
आपस में महासंग्राम हुई।

एक सभ्य सज्जन कहे जाने वाले 
जो रखते थे कंठ में मिसरी घौले 
उनकी वाणी की मिठास 
कानो को सुख प्रदान किया करती थी 

आज वो हलाहल हुए
कंठ उनके कितने बेसुरे हुए
वो धमकी और फब्तियां
वो भद्दी - भद्दी गालियां 

उस दिन कानो की शामत आई थी 
सबकी श्रुति भी शरमाई थी।
आप तो चिल्लाते रहे।
अहंकार में डूबे।
शर्म से मेरा माथा झूका था।

Author 
Kartik Kusum Yadav 

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