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जिनगी के असल रंग

युवा लोगन सभे,   इंस्टा पर झूमे,   गावे ला तराना,   देखअ ई कैसन जमाना।   रात-दिन मोबाइल में भुलाइल,   खेलअ-कूदअ त गइल भूल।   घर के कौना में सिमटल जिनिगी,   रंग-बिरंग सपना सभ मिटल।   माटी में खेलल भुलाईल,   जिनिगी जिए के मने भुलाइल।   कैसे समझाईं, ओहके कैसे मनाईं?   ए सुगना, ए बबुआ!   तनी घर से बाहर निकलअ,   खेलअ, कूदअ, दौड़अ धूपअ,   ई खुलल फिजा में विचरअ,   जीवन के असली रंग निहारअ।   खेतवा में सरसों के पियरी,   आपन नयन से तनि देखअ,   अमवा के डाली पर कोयली कूके,   ओकर मधुर तान सुनअ।   फुलवा पर देखअ   कैसे रंग-बिरंग तितली मडरातअ,   सुबह के ललकी किरिनिया,   घासवा पर शबनम के बूंद नया,   देखअ कैसे चमकअ त।   बांस के झुरमुट में   चहके ल चिरइया,   उजर आसमान में उजर बगुला,   देखअ कैसे उड़ रहल ह।   बगिया में दे...

प्रेम और परिवर्तन का संदेश

शक न करअ,   जिद पर न अड़अ,   ई बुरी वला ह।   सपना जे तोहार बा,   मन में जे इरादा बा,   उहो निक न ह।   मन में जे ईर्ष्या बा,   जीवन में ऊहापोह बा,   ओकर कारण तू ही ह।   ई काल चक्र ह जीवन के,   ई नित्य नवीन परिवर्तनशील ह।   तू कहा फसल बाड़नऽ   ई भौतिक वस्तु के मोह-माया में?   ई नश्वर, क्षणभंगुर ह।   एकरा जानअऽ, एकरा मानअऽ।   जिह्वा देलहन भोले बाबा,   त तनी शुभ-शुभ बोलअऽ।   बतइयां करे से पहिले तनीक,   हृदय के तराजू पर तोलअऽ।   अपन अहंकार के त्यागअ$,   प्रेम-दुलार के रंग में रंग जा।   प्रेम में ऐसे डूबअऽ,   जैसे हर जन आपन लागे।   ✍️ Kartik Kusum Yadav

छात्रों का अधिकार और आंदोलन की पुकार

शिक्षा, न्याय, रोजगार हक है हमारा।   लाख यातनाएं दो हमें,   लेकर रहेंगे अधिकार हमारा।   अरी ओ पुलिस कप्तान,   तूने जो लाठी चलवाई,   बन गया तू निर्दयी कसाई।   छात्रों की समस्या,   तुझे तनिक भी नजर न आई।   किसने आज्ञा दी तुझे   हम पर लाठी बरसाने की?   जाओ उस निकम्मी सरकार से कह दो   "छात्र आ रहे हैं, सिंहासन खाली करो!"   गुस्से का लहू रगों में दौड़ रहा है।   समर शेष है रण की।  अब आंदोलन का नाद सघन होगा,   गूंजेंगी शहर की सड़के और गलियां।   इंकलाब! इंकलाब! इंकलाब की बोलियां। अरे, बनकर निकलेगी जब सड़कों पर   अलग-अलग छात्रों की टोलियां।   ओ पुलिस! तेरी बंदूकें धरी की धरी रह जाएंगी,   कुछ न बिगाड़ पाएंगी गोलियां।   अभी भी वक्त है,   छात्रों का हृदय विशाल है।  जाओ, हमारी मांगों का संदेशा   उस कुंभकर्णी नींद में सोई सरकार तक पहुंचाओ।   कहना—   याचक नहीं हूं,...

आत्मबोध का आह्वान

तुझे लड़ना है,   मुझे प्यार बांटना है।   तुझे तोड़ना है,   मुझे जोड़ना है।   तेरी वाणी असभ्य,   मेरी सौम्य और सभ्य।   तू भौतिकता को सर्वोच्च माना,   मेरे लिए तुच्छ जहाँ सारा।   तेरे संस्कार तुझे मुबारक हो,   आओ संवाद करें,   सबकुछ यहाँ बराबर हो।   क्यों रूठे हो एक भूखंड के खातिर?   यह तो किराए का है,   आज तेरी तो कल किसी और की होगी।   अवसर मिला है क्षणिक,   मिलबांट कर उपभोग करो,   यही है इसका गणित।   इतनी बौद्धिकता भी नहीं,   तो तू उपभोग के अधिकारी नहीं।   त्याग करो, वत्स,  लोभ, मोह, मद, मत्स का।   अंगीकार करो, वत्स,   सत्य, न्याय, और सच का।   जिसने इसे स्वीकारा है,   वह फला-फूला और खुद को संवारा है।   जीवन के आखिरी पड़ाव पर सही,   कुछ करो आज और अभी यहीं।   घृणा की धधकती ज्वाला से बाहर निकलो,   अपने कोमल नयन संग मुस्...

नाम देव काम ऐब

नाम देव, काम ऐब   बातों में छल, दिखे फरेब।   देव का अर्थ, देवत्व से भरा,   शब्दों में उसकी, महिमा गहरा।   कैसी विडंबना है इस संसार की,   मनुज का नाम रखा ‘देव’ यहाँ,   मुख से निकले, शब्द अहंकारी,   गर्व से पढ़े, गालियाँ यहाँ।   थू-थू कर सब थूकें उसे,   कहे, "अरे मूर्ख! मत पढ़ गाली।"   संभाल मर्यादा, कर ख़्याल,   ईश्वर से कर, तू एक वादा।   मत कर रसपान गाली का,   रख संजीवनी, वाणी का। ✍️ कार्तिक कुसुम यादव

प्रभु

प्रभु तू हर ले,   काम, क्रोध, वासना को।   प्रभु तू हर ले,   छल, कपट, लोभ तृष्णा को। दिव्य मन, चंचल हो चितवन,   ऐसी वर दे, ऐसा हो तन-मन।   सद मार्ग पर चलकर नित्य,   अर्थपूर्ण हो मेरा कृत्य। प्रीत ऐसी हो वतन से,   खुद को अर्पण कर दूं, वतन पे।   आलस्य, निर्जीवता त्याग कर,   सजीवता का अंगीकार करू। प्रभु के चरणों में,   प्रभु का जय-जयकार करू।   मांगू हर चीज उनसे,   भारत देश के कल्याण का। सत्य, अहिंसा का हो वास,   हर हृदय में हो विश्वास।   धर्म और कर्म की हो साधना,   संविधान की हो आराधना। जन-जन में जगे नई आशा,   सपनों का भारत हो अभिलाषा।   भ्रष्टाचार से दूर हो हर जन,   सुचिता हो भारत की पहचान। विज्ञान, कला और नवाचार,   शिक्षा में हो अपार विस्तार।   सद्भाव, समानता, हो स्वाभिमान,   हर नर-नारी का हो सम्मान। पर्यावरण का हो संरक्षण,   हरे-भरे हों वन और उपवन।   जल, मृदा, औ...

पंच परमेश्वर

यह कैसा पंच परमेश्वर ? जिसमें न हो सत्य का स्वर  उनकी बात सुनो  तो,  बाते करता धरा से अम्बर । नीति व नियति का ज्ञान नहीं नैतिकता, रत्ती भर नहीं  आदर्श-मर्यादा को ठुकराकर अपने वचनों को ठहराहटा सही। यह कैसे पंच परमेश्वर  जिसमे न हो सत्य का स्वर खुद की तारीफो में कसीदे पढ़ते  कितने झगड़े को सुलझाया  यू ही, मैं पलक झपकते । वो अपनी अतीत की दुनिया  से, सबको रूबरू कराता। महज सौलह वर्ष का रहा होगा न्याय वेदी का प्रतिमूर्ति कहलाता। इतने दिव्य गुणों से सुशोभित  क्यों नहीं रखते प्रियजानो से मीत ?   कभी तो अपने उर, टटोलकर देख। या पढ़ प्रेमचंद्र रचित, अलगू चौधरी और जुम्मन शेख। असली पंच परमेश्वर से साक्षात्कार होगा तेरे अधरो पर न्याय का स्वर आएगा। हे दुनिया-जहान के न्याय देवता तेरे घर में भी नहीं है एकता। आपके कौशल और चातुर्य  अपनो के न्याय में क्यों पड़ जाती हैं शिथिलता । यह सब देख मुझे, होती हैं हैरानी और कौतुहलता। संपत्ति की इतनी लोभ दुर्गति होगी, करो जरा तुम क्षोभ कैसे समाज गढ़ना चाहते हो ? सिर्फ संपत्ति ठगने की चाह रखते हो। वो दिवस आज भी याद...