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स्मृतियों का संग्रहालय।

यह मधुमास मिला है साथी, आओ मिलकर रास रचाएँ,
यह क्षण-भंगुर पल ढल जाएगा, मिलकर नव-आनंद मनाएँ।
साक्षी केवल रह जाएँगी
छाया-छवियाँ, वीथी-गलियाँ, गगन-सितारे और कलियाँ!
जब युग-युग बाद सँभालेंगे, अतीत के बिखरे पन्नों को,
याद करेंगे पग-पथ सारे, वाटिका-पुष्प और उपवन को।
स्मृति-पट पर उभर आएगा, वह स्वर्णिम महाविद्यालय,
याद आएँगे सखा-सहचर, वह नेह-सनेहा का आलय।
हम मंद-मंद मुसकाएँगे, क्या पावन दिन वे पावन थे!
अगाध-अतल वह बंधुत्व था, मीठे शिकवे मनभावन थे!
वह प्रथम-प्रणय की रसमयता, प्रेयसी-दृष्टि का वह प्रकाश,
अनुराग-विवश वह पागलपन, ढूँढता रहा जो निज-आकाश!
कॉलेज के तुंग-द्वारों पर, निज प्रिय के पथ को जोहना,
चंचल नयनों के नीरद से, उस रूप-सुधा को मोहना!
जीवन का यह संपूर्ण चित्र, केवल स्मृतियाँ बन जाएगा,
समय-चक्र के आवर्तन में, यह रूप-दृश्य ढल जाएगा।
अतः सहेज लो इन दृश्यों को, लोचनों के नीड़-विहंग में,
एक संग्रहालय रचो हृदय में, जहाँ सुरभि हो प्रति-रंग में।
जब काल-चक्र के पन्ने कुछ, अतीत-गर्भ में जाएँगे,
तब इस संचित संग्रहालय से, कुछ चित्र निकाल लाएँगे...
हम पुनरावृत्ति के क्षण में जाकर, अमर-सुकून पा जाएँगे!

कार्तिक कुसुम यादव 

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नयना तोर निरखत

नयना तोर निरखत, सपना देखत, सुघर रूपवा, गोरी तोर चमकत। बलखत केशिया, जान मारे हमरा, तोर बिना हम हियो अधूरा। सूरतिया बस गइल जब से दिल में, मन न लागे हमरा कोनो महफिल में। ई दिलवा तो दीवाना हो रानी, तोहर प्यार में । बाटियां निहारो हियो, तोरे इंतजार में। जे दिन तोर मिलन न होई, ओ दिन मनवा खूबे रोई। तोहर याद में बइठल रहि जाई, अँखियन में तैरै तोरे छविया। मन में ऊ चेहरा, बेरी-बेरी आवे, ऊ सुघर रूपवा, केतना सतावे। नील नयनवा तोर, नशा करावे, ऊपर से चश्मा, जान मार जाए। देहिया के अंगिया, नेहिया बढ़ावे, हमर सपनवा में बस तू ही आवे। मन न लागे एको पहर तोर बिन, रतिया कटे अब तारे गिन गिन। मन करे प्रेम के पंछी बन उड़ जियो, तोहर अटारिया पे आ के बइठी जियो। दिलवा के बतीयां तोहरे बतिईयों। केतना प्यार बा हमर दिल में एक पल बता दी तोह से मिल के। नयना तोर निरखत, सपना देखत, सुघर रूपवा, गोरी तोर चमकत। ✍️ रचनाकार: कार्तिक कुसुम मेरी और भी लिरिक्स पढ़ने के लिए नीचे दिए गए  लिंक पर क्लिक करें 👇 https://mittikesur.blogspot.com

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