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Showing posts from July, 2026

माधव

माधव... तेरे सम्मुख हूँ। नादान हूँ, मूर्ख हूँ। तू सर्वज्ञ है, तू मन की जानता है। क्या माँगूँ? तू ही तो विधाता है। मेरे हृदय में तू, मेरे गीत में तू। हर पल गाता हूँ, तुम्हें ही गुनगुनाता हूँ। आज नि:शब्द हूँ। ज़रा देख तो, मेरे हृदय की पीड़ा। हृदय के कोने में, किसी को खोने का भय... ✍️Kartik Kusum 

स्मृतियों का संग्रहालय।

यह मधुमास मिला है साथी, आओ मिलकर रास रचाएँ, यह क्षण-भंगुर पल ढल जाएगा, मिलकर नव-आनंद मनाएँ। साक्षी केवल रह जाएँगी छाया-छवियाँ, वीथी-गलियाँ, गगन-सितारे और कलियाँ! जब युग-युग बाद सँभालेंगे, अतीत के बिखरे पन्नों को, याद करेंगे पग-पथ सारे, वाटिका-पुष्प और उपवन को। स्मृति-पट पर उभर आएगा, वह स्वर्णिम महाविद्यालय, याद आएँगे सखा-सहचर, वह नेह-सनेहा का आलय। हम मंद-मंद मुसकाएँगे, क्या पावन दिन वे पावन थे! अगाध-अतल वह बंधुत्व था, मीठे शिकवे मनभावन थे! वह प्रथम-प्रणय की रसमयता, प्रेयसी-दृष्टि का वह प्रकाश, अनुराग-विवश वह पागलपन, ढूँढता रहा जो निज-आकाश! कॉलेज के तुंग-द्वारों पर, निज प्रिय के पथ को जोहना, चंचल नयनों के नीरद से, उस रूप-सुधा को मोहना! जीवन का यह संपूर्ण चित्र, केवल स्मृतियाँ बन जाएगा, समय-चक्र के आवर्तन में, यह रूप-दृश्य ढल जाएगा। अतः सहेज लो इन दृश्यों को, लोचनों के नीड़-विहंग में, एक संग्रहालय रचो हृदय में, जहाँ सुरभि हो प्रति-रंग में। जब काल-चक्र के पन्ने कुछ, अतीत-गर्भ में जाएँगे, तब इस संचित संग्रहालय से, कुछ चित्र निकाल लाएँगे... हम पुनरावृत्ति के क्षण में जाकर, अमर-सुकून पा जाएँ...