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आप है।

आप है। तभी तो यह जग है। 
एहसास हो या ना हो क्या फर्क पड़ता
आप से ही तो सारी कायनात है।
आप है तो।
यह हरे-भरे जंगल है।
आप से ही तो अरण्य में वन्यजीव है।
आप है।
तभी तो अमराई  में कोयल की कूक है।
दुनिया के इस दर्पण के सामने
कभी तो अपना आनन लाकर देखें ।
आप ही आप दिखेंगे।
आप है।
तभी तो वनस्पतियों पर कुसुम है।
आपसे ही तो।
वृक्षों पर गिलहरियों की चढ़ने-उतरने की क्रीड़ा है
आप है ।
तो भौंरा गाते है ।
आपसे ही तो
वनों की नैसर्गिक सुंदरता है।
नि:शब्द स्तब्ध तिमिर की बेला में
दूर कहीं अरण्य से जब मयूर गाती है।
तो मुझे एहसास होता है
यह सब आपकी वजह से तो है
फिर खुद की अस्तित्व पर सवाल क्यों ?
आपके भौतिक रूप से होने का इतने साक्ष्य पड़े हैं
फिर भी खुद को खुद में ढूंढने चले क्यों ?

✍️ Kartik Kusum Yadav 










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