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मंजूषा चित्रशैली

भागलपुर क्षेत्र की लोक कथाओं में अधिक प्रचलित ' बिहुला विषहरी' की कथाएं ही इस चित्र शैली में चित्रित होती है। मूलतः भागलपुर (अंग) क्षेत्र में सुपरिचित इस चित्र शैली में मंदिर जैसी दिखने वाली एक मंजूषा, जो सनाठी (सनाई) की लकड़ी से बनाई होती है। पर बिहुला विषहरी की गाथाओं से संबंधित चित्र कुचियो द्वारा बनाए जाते हैं। इस चित्रकला की एक विशेषता यह है कि इसमें स्त्री-पुरुषों के चेहरे का सिर्फ बया पक्ष ही बनाया जाता है। इस चित्र शैली के चित्रों को भागलपुर-दिल्ली विक्रमशिला एक्सप्रेस रेलगाड़ी में चित्रित किया गया है।

राजनीति में एक सुशिक्षित एवं संगठित लोगो को होना क्यों जरुरी है। आलोचनात्मक समीक्षा ।

कोई भी शासन प्रणाली तभी सफल हो सकती है जब तक उसके सदस्यगण शिक्षित हो। अथार्थ शिक्षा वह कारगर हथियार है जिसके माध्यम से नीति का नियमन और उसका भली-भांति क्रियांवयन होता है। हालांकि वर्तमान परिपेक्ष में विधान मंडलो के सदस्य भली-भांति शिक्षित नहीं होते, बावजूद इसके कार्यपालिका के सदस्यों के द्वारा क्रियांवयन होता रहता है। इससे शासन प्रणाली में गतिरोध जारी है। इन अशिक्षित सदस्यों के कारण यह सीमितयाँ मात्र राजनीतिक संस्थाएं बनती जा रही है। जो लोकतांत्रिक शासन में एक अभिशाप है।                    पंचायत एवं अन्य संस्थाओं हेतु कुशल सदस्यों के चयन में आम-जन की जागरुकता एवं उनका भली-भांति शिक्षित होना अनिवार्य है। एक शिक्षित आम जनता ही कुशल प्रशासक का चयन कर सकती है। शिक्षित होने से आम जनता में जागरुकता का संचार होता है। जागरुक जनता ही अपने हक एवं अधिकार को समझ सकती है। सरकार के विभिन्न योजनाओं को सफल बनाने में आम जन की जागरुकता शासन के लिए उत्प्रेरक तत्व एवं योजना को सफलीभूत होने में मददगार सिद्ध होती है। यह आम जन ही स्वयं में से शिक्षित प्रशासक ...

पटना कलम चित्रकला शैली

बिहार प्रदेश की गौरवशाली परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में पटना कलम चित्रकला का उच्च स्थान है। मध्यकालीन बिहार में पटना कलम चित्रकला ने बिहार के कला क्षेत्र को काफी समृद्ध किया। पटना कलम चित्रकला का विकास मुगल साम्राज्य के पतन के बाद उत्पन्न परिस्थितियों में हुआ। औरंगजेब द्वारा राज दरबार से कला के विस्थापन तथा मुगलों के पतन के बाद विभिन्न कलाकारों ने क्षेत्रीय नबाव के यहां आश्रय लिया इससे कला के विभिन्न क्षेत्रीय रूप उभरे जिनमें पटना शैली प्रमुख है। इस शैली का विकास 18वीं सदी के मध्य से लेकर बीसवीं सदी के आरंभ तक हुआ। इस शैली पर एक ओर  मुग़लशाही शैली का प्रभाव है तो दूसरी और तत्कालीन ब्रिटिश कला का भी प्रभाव है। इसके अतिरिक्त इसमें स्थानीय विशिष्टताएं भी स्पष्ट है। मुगल तत्व, स्थानीय भारतीय तत्व एवं यूरोपीय तत्वों के सम्मिश्रण के कारण इस शैली की अलग पहचान बनी है। तत्कालीन नवधनाढ्य भारतीय एवं ब्रिटिश कलाप्रेमी इस कला के संरक्षक और खरीददार थे। पटना कलम के चित्र लघु चित्र की श्रेणी में आते हैं। जिन्हें अधिकतर कागज एवं कहीं-कहीं हाथी दांत पर बनाया गया है। इस शैली का मुख्य विषय जनसा...

संथाल विद्रोह (1855-56)

 संथाल विद्रोह   में सबसे प्रमुख था 1855-56 ई० का विद्रोह। संथाल पूर्वी बिहार के भागलपुर से राजमहल तक के क्षेत्र में निवास करते आ रहे थे। इस क्षेत्र को ' दमन ए कोह ' कहा जाता था। क्षेत्र की जमीन को काफी मेहनत से उपजाऊ और कृषि योग्य बनाकर वह यहां झूम एवं पंडू विधि से कृषि किया करते थे। इस कारण जमीन से उनका भावनात्मक संबंध बन चुका था। संथालो का अपना धार्मिक सामाजिक एवं राजनीतिक ढांचा भी था।  ब्रिटिश शासन की शुरुआत ने उनके जीवन को तहस-नहस कर दिया। उनके सरदारों को जमींदारों का दर्जा देकर लगान की नई व्यवस्था लागू कर दी गई। संथालो द्वारा उत्पादित प्रत्येक वस्तु पर कर आरोपित कर दिया गया। कर वसूली के लिए उतरी बिहार के लोगों की नियुक्ति की गई। समय पर लगान न देने के कारण उनकी जमीन नीलाम की जाने लगी। इस स्थिति से बचने के लिए संथाल महाजनों और साहूकारों पर आश्रित होते चले गए। यह महाजन कर्ज के बदले संथाल बहू बेटियों की आबरू लूटने की कोशिश तक करने लगे। इस स्थिति में पुलिस और न्यायालय ने भी संस्थानों का साथ नहीं दिया। इस तरह यह लोग औपनिवेशिक  अर्थव्यवस्था के जाल में फंस गए। परि...